Wednesday, 3 April 2013

सपनो में महंगाई .....

आज हमारे सपने में आधी रोटी आई है ,
जिसके बलिदानों का कारण एक यही महंगाई है
सरकारे कहती रहती है कि होगी अब महंगाई कम,
होगा पेट भरा सबका और शिक्षित होगा अब जन-जन,
सुनते सुनते इनके वादे महंगाई बढती जाती है,
भूको मरते है लाखो और ये मलाई खाती है
उठते जाते दिन दिन मुद्दे फिर भी ना चुनती ये कोई राह,
फिर आते है नए वादों के साथ कई नई सरकार,
फिर सिहर उठता है आम आदमी का घर-बार,
फिर वादों में अटकलों को गिनाती रहती ये सरकार,
फिर से आज नये सपनो में एक उदासी छाई है,

आज हमारे सपने में आधी रोटी आई है ,
जिसके बलिदानों का कारण एक यही महंगाई है....





डर..

कुछ सहमा कुछ बदला सा है,
 जीवन का हर मंजर,
डरते चलती इन सपनो में,
 लग ना जाये खंजर,
सब दिखते है अपनों जैसे,
कैसे समझु मंजर,
कुछ सहमा कुछ बदला सा है,
 जीवन का हर मंजर,
हर शब्दों में भी आज चुभन है,
अपनों का बस नाम रहा है,
क्या जाने क्या क्या सोचे है,
मानव बना है भक्षक,

कुछ सहमा कुछ बदला सा है,
 जीवन का हर मंजर,

डरते चलती इन सपनो में,
 लग ना जाये खंजर......