Wednesday, 3 April 2013

डर..

कुछ सहमा कुछ बदला सा है,
 जीवन का हर मंजर,
डरते चलती इन सपनो में,
 लग ना जाये खंजर,
सब दिखते है अपनों जैसे,
कैसे समझु मंजर,
कुछ सहमा कुछ बदला सा है,
 जीवन का हर मंजर,
हर शब्दों में भी आज चुभन है,
अपनों का बस नाम रहा है,
क्या जाने क्या क्या सोचे है,
मानव बना है भक्षक,

कुछ सहमा कुछ बदला सा है,
 जीवन का हर मंजर,

डरते चलती इन सपनो में,
 लग ना जाये खंजर......





No comments:

Post a Comment