Wednesday, 20 February 2013

यूँ  तो हर कदम पर
 जीवन जीने की  इच्छा हैं ,
हर राह पर उस
 विष को पीने  की  इच्छा हैं ,
चलती हूँ उन काँटो पर 
 फूलो पर चलने  की  इच्छा हैं ,
हर वक्त सोचती हूँ
 उस सोच की चाल से बढ़ने  की  इच्छा हैं ,

लगता है बढ़ तो जाऊँगी 
पर इस पथ पर रूकने  की  इच्छा हैं ,
घबराती हूँ कहने  से 
पर इसी ऊम्र में जीने की इच्छा हैं,
यूँ  तो हर कदम पर
 जीवन जीने की  इच्छा हैं ,
हर राह पर उस
 विष को पीने  की  इच्छा हैं .......

यह विराम पल दो पल का है .......

यह विराम पल दो पल का है 
कुछ समय कुछ परिस्तिथी का है 

क्या दोष इसमें किसी का है ,
ना वक्त का है ना सीमा का है 

ना चलती है कश्ती ,
कुछ कागज का है कुछ फुलो का है 

यह विराम पल दो पल का ,है 
कुछ समय कुछ परिस्तिथी का है

क्या  सोचने का कारण है ,
ना सपना है ना चिन्ता है 

ना रुकती है  जिन्दगी,
कुछ बहने  का है कुछ बढ़ने  का है 

यह विराम पल दो पल का है 
कुछ समय कुछ परिस्तिथी का है।